कहानी
लेखक - सिराज फ़ारूक़ी,पनवेल
जब अल्लाहबख़्श मरने
लगे, तो अपने जिगरी दोस्त ओमकार को बुलाकर कहा,’’दोस्त! अब तो हम चलते
हैं... अब....यह फ़ुज़ेल तुम्हारे हवाले...... ध्यान रखना......!‘‘
यह कहते-कहते उनकी आंखें भर आईं. पैमानये-ज़ब्त छलक पडा़. दोस्त ने
दोस्त का हाथ बड़ी ही गर्मजोशी से पकड़ लिया,’’ दोस्त, ऐसा क्यों कहते हो?
अभी तुम जिओगे. अभी तुम ने तो फुज़ेल का बचपना देखा. जवानी तो देखना बाक़ी
है......!‘‘
और वह जैसे ही दोस्त के हाथ से अपना हाथ अलाहदा करके बाजू में खड़े 8
साला फ़ुज़ेल के सर पर रखने लगे. दोस्त की जान निकल गई. सर एक तरफ लुढ़क
गया. जैसे उनकी रूह दोस्त की ज़बान से यही सुनने के लिए रूकी हुई थी.
ओमकार
ने जब अपने दोस्त की जान को निकलते देखा, तो तड़प उठे. जी में आया दोस्त
की रूह को रोक लें. मगर ऐसा न कर सके. जब यही ताकत इंसान में आ जाए तो फिर
इंसान,इंसान कहां? वह तो कुछ और ही हो जाए. उन्हें अपनी इस मजबूरी पर बड़ी
पशेमानी हुई. मगर क्या कर सकते थे? दोस्त को और उसके यतीम बच्चे को गले
लगाकर रो पड़े.
ओमकार और अल्लाहबख़्श जिगरी दोस्त थे. अल्लाहबख़्श इलाहाबाद से आ कर
मुम्बई शहर में आबाद हुए थे और यहां एक फ़ैक्टरी में नौकर लग गए थे. वहीं
उन दोनों की पहचान हुई और दोनों दोस्त बन गए. उनकी दोस्ती उस वक्त पक्की
हुई, जब ओमकार को पांच हज़ार रूपयों की सख़्त जरूरत आन पड़ी.
हुआ यह था कि वह ’गन्ना के रस‘ की दूकान शुरू करना चाहते थे. और
उन्हें वह दूकान ख़ूब वाजबी दामों में मिल रही थी. बाकी सब रूपयों का
बंदोबस्त हो चुका था. बस पांच हज़ार रूपए कम थे. रूपया अदा करने के लिए बस
एक दिन बाकी था. अगर वह तय की गई रक़म वक्त पर नहीं देते हैं, तो पेशगी में
दी गई रक़म ज़ब्त हो जाएगी और वह दूकान भी हाथ से निकल जाएगी. ऐसी शर्त थी
उनके सौदे में. वह बहुत परेशान थे. क्या करें उनकी समझ में कुछ नहीं आता
था. जितनी कोशिशें करना था, कर चुके थे. जहाॅ-जहाॅ से रूपया मिलना था,ले
चुके थे. जितने भी नाते-रिश्तेदार या हमदर्द,जान-पहचान वाले थे सबको आज़मा
चुके थे. अब कोई आशा न थी. ऐसे में अल्लाहबख़्श उनके सामने आशा की नई किरन
बनकर आए. और उन्होंने उनकी उम्मीदों को जिं़दगी बख़्शी.
ओमकार ने उनके पैर पकड़ लिए,’’आप मेरे लिए देवदूत बनकर आए......!‘‘
’’नहीं,ऐसा
मत कहिए...यह इंसान की तौहीन होगी...मैं इंसान हॅू.....कोई
फ़रिश्ता-वरिश्ता नहीं....फ़रिश्तों से जोड़कर मेरी या इंसान की तौहीन मत
कीजिए...इंसानों को ख़ुदा ने दर्द-दिल के वासते ही पैदा किया है....और
जिसके दिल में ददे्र-इंसानियत न हो वह इंसान ही क्या....?‘‘
’’सच कहा....!‘‘और फिर वह उनका हाथ बड़ी अपनाईयत से पकड़ लिए.
उस दिन से उन दोनों की दोस्ती में जो प्यार और शहद घुली तो अबतक बरकरार रही;
ओमकार की दूकान तो चलने लगी. मगर उनके परिवार पर
मुसीबतों के पहाड़ टूटना शुरू हो गया. बीवी तो पहले से ही बीमार चल रही थी.
फ़ारिग़ुलबाली न होने की वजह से इलाज अच्छा नहीं हो पा रहा था. जिसकी वजह
से बीमारी आहिस्ता-आहिस्ता अपना घर करती गई.
लेकिन,जब पैसा आने लगा तो इलाज के ख़र्च भी बढ़ते गए. और इस क़द्र
बढ़े कि खाने-पीने की तंगी होने लगी. इस दौरान भी अल्लाहबख़्श ने उनकी दिल
खोलकर मदद की. रात-रात भर उनके साथ अस्पताल में रहते. उनकी हिम्मत बॅधाते
और साथ ही साथ उनके दूकान की देख-रेख भी करते.अफ़सोस,मगर उनकी बीवी बच नहीं
सकी.
अभी उनकी बीवी को मरे हुए तीन दिन भी नहीं हुए थे कि उनकी छोटी बेटी
पर काॅलरा का हमला हो गया. अस्पताल में दाखि़ल कराया गया. मगर आनन-फ़ानन वह
भी भगवान को प्यारी हो गई.
ऐसे वक़्त में, अगर अल्लाहबख़्श का
सहारा न होता, तो वह भी सदमा से मर गए होते. अल्लाहबख़्श के रूप में उनको
एक भाई मिला था और वह भी ऐसा कि सगे से बढ़ कर. दोनों की दोस्ती ऐसे ही
चलती रही कि एक दिन अल्लाहबख़्श की बीवी भी चल बसी. ओमकार अपनी बीवी और
बच्ची की मौत से संभल गए थे, मगर इस हालत में अल्लाहबख़्श खुद को न संभाल
पाए. और वह अपनी बेगम की जुदाई का ग़म चुप-चुप दिल में पालते रहे और फिर उस
दीमक ने उन्हें अंदर ही अंदर चाटना शुरू कर दिया.
ओमकार को अल्लाहबख़्श की गिरती हुई सेहत देखकर बड़ी ही तशवीश होती. वह
उन्हें समझाते भी और अपनी मिसाल भी देते,’’देखो, मैं कैसे हॅू? मुझ जैसा
कमज़ोर इंसान संभल सकता है, तो क्या तुम नहीं संभल सकते....तुम तो मर्द-आहन
हो....मुझसे हद दर्जा मज़बूत और तवाना....हिम्मत न हारो... मैं हॅू न
...‘‘
अल्लाहबख़्श,बस हां-हां करके रह जाते,मगर दिल में जो कीड़ा लग चुका
था, उसे न निकाल पाए. लिहाज़ा,सेहत दिन-ब-दिन गिरती गई;और आज दुनिया से चल
बसे.
अब ओमकार तन्हा थे. उनके दिल में आया. अब जीने में रखा ही
क्या है? बीवी गई, बच्ची गई. एक दोस्त था भाई जैसा, वह भी चला गया. क्यों न
जीवन का ख़ात्मा कर लॅू. मगर जब फुज़ेल की शक्ल में दोस्त की
जि़म्मादारियां याद आ जातीं, तो चैंक जाते और फुज़ेल को सीने से लगा
लेते,’’ मुझे जीना है फुज़ेल के लिए....!‘‘ और फूट-फूट कर रो पड़ते.
अल्लाहबख़्श के इंतक़ाल के बाद उन्होंने फुज़ेल को एक अच्छे स्कूल में
दाखि़ल करवा दिया. अब उनकी जिंदगी का कुल एक ही मक़सद था. और वह था
फुज़ेल की अच्छी तालीम व तरबीयत. वह सोते तो यही सोचते और जागते तो यही
देखते.
दिन गुज़रते गए. हालात
सुधरते गए. एक दिन वह भी आया जब फुज़ेल पढ़-लिख कर कामयाब इंजीनियर बन गया.
उसकी क़दकाठी देखकर ओमकार को फख़्र महसूस होता. सोचता, अगर आज उनका दोस्त
अल्लाहबख़्श जि़ंदा होता, तो अपने बच्चे को देखकर कितना ख़ुश होता.
एक दिन फुज़ेल बोला,’’काका, मैं दुबई जाना चाहता हॅू....वहां से एक
कंपनी का आॅफ़र आया हुआ है. पगार भी ख़ूब अच्छी है. बोलो, आप क्या कहते
हैं......?‘‘
काका ने बलाएं लेकर कहा,’’तुमको, तुम्हारे काका भी
उम्र लग जाए. जाओ बेटा, तुम्हारी ख़ुशी में तुम्हारे काका की ख़ुशी है. जो
तुम अच्छा समझो करो. मुझे तुमपर पूरा भरोसा है....!‘‘
काका के इस एत्माद और भरोसे को देखकर फुज़ेल भी निहाल हो गया. फुज़ेल
एक शरीफ़ नौजवान था. वह आज के नौजवानों जैसा नहीं था. वह बड़े-बूढ़ों की
खूब इज़्ज़त करता था. और सलीक़े से बातचीत भी करता था. उसमें अदब व एहतराम
कूट-कूट कर भरा हुआ था. वह काका के एक-एक हुक्म पर बिछ जाता था. जिस काम के
लिए काका मना कर दिए वह कभी न किया. और जिस काम को कह दिए फ़ौरन कर डालता.
उसकी इस फ़रमाबरदारी को देखकर काका बहुत ख़ुश होते. आज भी वैसा ही हुआ.
काका ने कहा,’’ बेटा, तुम तो दुबई जा रहे हो... ठीक है. कोई बात नहीं.... जाओ. मगर एक मंशा है मेरी.....!‘‘ इतना कहकर वह रूक गए.
फुजे़ल
उन्हें हैरत व प्यार से देखने लगा कि काका क्या कहना चाहते हैं? उसने बड़े
ही नर्म और सुशता लहज़े में कहा,’’ बोलिए काका, क्यों रूक गए....? क्या
मैंने कभी आपका कोई हुक्म टाला है.... बे झिझक कहिए....आपका हर हुक्म सर
आॅखों पर......!‘‘
काका बेझिझक कह गए,’’मैंने सोचा है,जाने से पहले तुम्हारा निकाह कर दॅू......‘‘
इस
बात पर फुज़ेल बड़े ज़ोरों से हॅस पड़ा.पहले तो उसे लगा. काका कोई गूढ़
बात कहेंगे.मगर जब शादी की बात कही तो यकायक उसे हॅसी आ गई.क्योंकि यह सब
तो उसके वहम व गुमान में भी न था.
जब उसकी हॅसी रूकी तो काका ने गंभीर लहजे में कहा,’’बेटा,जब तुम चले
जाओगे तो अकेला रह जाऊंगा. बहू घर में आ जाएगी तो अच्छा रहेगा. और दूसरी
बात जिं़दगी और मौत का क्या ठिकाना? मैं सोचता हॅू, अपनी जिं़दगी में यह
फ़जऱ् अदा कर जाऊं. क्या पता, तुम आओ तो मैं रहॅू या न रहॅू....?‘‘
’’काका....!‘‘ फुज़ेल ने बढ़कर काका के मुंह पर हाथ रख दिया,’’ ऐसा मत कहो..... अल्लाह करे आपको हमारी भी उम्र लग जाए.....‘‘
फुज़ेल
के वालिद जि़ंदा नहीं थे काका ने जिस सलीके़ और कुरबानी से उसकी परवरिश की
थी. वह उनको वालिदे-मोहतरम की हैसियत से ही प्यार करता था. उसके दिल में
उनके तईं अपने वालिद से कम इज़्ज़त नहीं थी.
काका फुज़ेल का यह जुमला सुनकर बाग़-बाग़ हो गए. उनकी आंखों में
मुहब्बत और शफ़क़त के आंसू छलक आए,’’ बेटा, इतनी भी उम्र मत दे..... जी
लिया....बहुत जी लिया. अब और जीने की तमन्ना नहीं.....अब तो बस इतनी सी
आरज़ू है कि तुम मेरे सामने एक आलीशान जि़ंदगी जिओ. और यह सब देखते-देखते
मैं इस दुनिया से कूच कर जाऊं....!‘‘
थोड़ा रूकने के बाद वह आगे बोले,’’मैंने तुम्हारे लिए बादशाह हुसैन की
लड़की सईदा बेगम को पसंद कर लिया है. बोलो, तुम्हारा इरादा क्या
है.....?‘‘
काका के यह अल्फ़ाज़ सुनकर फुजे़ल ने फ़रमाबरदारी का
सुबूत दिया. सर झुकाकर कहा,’’मेरा इरादा क्या है.....? आपका जो इरादा
है.....वही मेरा भी है......बाप से जो अलग हो, वह बेटा ही क्या...?
फुज़ेल के यह अल्फ़ाज़ सुनकर ओमकर गदगद हो गए और सोचने लगे,’अगर आज
उनका भी बेटा होता तो क्या ऐसे मामले में ऐसी फ़र्माब्रदारी का सुबूत
देता...शायद हाॅ....शायद नहीं....‘वह जज़्बात से मग़लूब होकर बोले,’’
नहीं-नहीं... ऐसा नहीं, जो इरादा हो साफ़-साफ़ कहो.... मैं अपनी पसंद तुम
पर थोपना नहीं चाहता.....!‘‘
’’नहीं काका, ऐसा नहीं.....आप जो फै़सला कर चुके, मेरे लिए पत्थर की
लकीर है....और दूसरी बात आप बड़े है....बुजुर्ग हैं...जहाॅदीदा हैं....आप
जो फै़सला लिए हैं. कुछ सोच-समझकर ही लिए हैं.....‘‘
’’तुम्हारी
फ़र्माबरदारी पर कुरबान मेरे लाल.....!‘‘और काका ने उसका सर पकड़कर प्यार
से पेशानी को चूम लिया. और बड़े ही लाड व प्यार से कहा,’’नहीं-नहीं, बेटा
ऐसे नहीं....तुम भी पढ़े-लिखे हो...जवान हो...... दुनिया देख रहे हो.....
अगर तुम्हारी कोई पसंद हो तो बताओ..... मैं तुम्हारी ख़्वाहिश का एहतराम
करूंगा.... अगर छोटे बड़ों की इज़्ज़त करें....उनकी मान-मर्यादा और
ख़्वाहिश का लिहाज़ रखें, तो बड़ों का भी यह फ़र्ज़ बनता है कि छोटांे की
ख़्वाहिश और उनकी तमन्ना का एहतराम करें......‘‘
’’यह तो आपका बड़प्पन है काका......!‘‘
’’नहीं-नहीं, तुम कहो.....!‘‘
जब
काका ने बहुत इस्रार किया तो उसने कहा,’’ऐसा कुछ भी नहीं है.... आप
बेफि़क्र रहें. मैं कभी भी इन मामलों में यानी लड़कियों के पीछे पड़ा ही
नहीं. अगर पड़ा होता तो शायद आज मेरा रिज़ल्ट इतना बेहतरीन और शानदार नहीं
होता......करेक्टर इज़ द बेस्ट परफ़ार्मेंस आॅफ़ दिस लाइफ़....!‘‘
काका ख़ुश होकर फ़र्ते-जज़्बात से उसको सीने से लगा लिए और उसकी पुश्त
को थपथपाए,’’वाह मेरे लाल...जवानी तुम पर नाज़ करे और मुल्को-कौम को तुम
पर फ़ख़्र हो. अगर तुम्हारे जैसा हर घर में एक-एक फुजे़ल पैदा हो जाए तो
देश के नसीब का सितारा ही कुछ और हो जाए....‘‘
बादशाह हुसैन से ओमकार
मिले. वैसे तो वह रोज़ ही मिलते थे.वह उन्हीं की बस्ती के थे. बड़े नेक और
शरीफ़ इंसान थे. आते-जाते ख़ैर-ख़ैरियत पूछी जाती.दुआ-सलाम होता.वह इसी
दौरान बादशाह हुसैन की लड़की को देखे थे. बला की ख़ूबसूरत, सेहतमन्द, गोरी
रंगत और बड़ी-बड़ी स्याह आंखों वाली थी. वह जब उसे आते जाते देखते, उन्हें
ऐसा लगता है. वह फुज़ेल के लिए ही बनी है.
मगर, वह कभी बादशाह हुसैन से इस बारे में गुफ़्तगू न कर सके थे. बस
दिल में ये खयाल पाले रखा कि जब कभी मुनासिब मौक़ा हाथ लगेगा तो बात कर
लेंगे? मगर, इससे पहले वह फुजे़ल के दिल की थाह लेना चाहते थे. आज, जब उसके
दिल की थाह ले लिए. तो बेफि़क्र होकर बादशाह हुसैन के पास पहुंच
गए,‘‘बादशाह भाई,हम आप से कुछ मांगें तो क्या देंगे...?‘‘वह चुहल करने के
लहजे में हंसते हुए बोले.
‘‘आप हमारी जान मांग लें ओमकार भाई, कोई तरद्दुद न होगा......‘‘बादशाह हुसैन ने ख़ुशदिली का मुज़ाहिरा किया.
’’नहीं भई, जान लेकर क्या करेंगे. एक ही है और उसके पीछे हज़ारो बलाएं पड़ी हुई हैं. संभालना मुश्किल है.......!‘‘
’’फिर कहिए. क्या चाहिए......?‘‘
’’बादशाह भाई, अगर आप इंकार न करें तो हम आपकी सईदा बेटी का हाथ अपने बेटे फुज़ेल के लिए मांगते हैं......‘‘
बादशाह भाई थोड़ी देर के लिए पसो-पेश में पड़ गए. मगर थोड़े वक़्फ़े के बाद मुसकुराते हुए कहा,’’ठीक है भाई,जैसी आपकी मजऱ्ी....!‘‘
इस पर ओमकार ने कहा,’’भई, एकबार अपनी बेटी सईदा से पूछ लीजिए.....‘‘
ओमकार की यह बातें सुनकर बादशाह हुसैन हॅस दिए.
’’क्यों हॅस रहे हो भाई....?‘‘ ओमकार ने सवाल किया,’’ क्या हमने कुछ ग़लत कह दिया है....‘‘
’’यह बात नहीं, ओमकार भाई..... आपने जो कह दिया सईदा से पूछ लेना, भई
वह हमारी बेटी है. भले ही वह आज की तालीम से रोशनाश है. मगर ख़ालिस मशरिक़ी
और इसलामी ख़्याल की है. और हमने परवरिश भी इसी ढंग से की है......अगर
आपको यक़ीन न आए तो जाकर ख़ुद ही पूछ लीजिए. मैं यहीं पर बैठा हॅू. वह यही
कहेगी. हमारे माॅ-बाप जो कहेंगे वही मेरे लिए बेहतर होगा....!‘‘
’’क्या कहते हो......?‘‘उन्हंे ताज्जुब हुआ.
’’हां.......यही ख़्याल है उसका.....!‘‘
’’यही ख़्याल तो हमारे बेटे फुजे़ल का भी है.....‘‘
’’तो ख़ूब गुज़रेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो......‘‘
और फिर दोनों क़हक़हा मार कर हॅसने लगे.
’’तो फिर यह रिश्ता मंज़ूर है.......‘‘
’’सौ फ़ीसदी मंज़ूर है.........!‘‘
और
फिर ओमकार ने अपना पूरा मुद्दा भी बयान कर दिया. उनका बेटा फुज़ेल दो बरस
के लिए दुबई जाना चाहता है. इसलिए वह चाहते हैं, उसका निकाह जल्द से जल्द
कर दें. और जब वह वापस आए तो अपनी दुल्हन को ख़ुद लेकर जाए.
बादशाह हुसैन यह बात मान लिए. क्योंकि अभी उनकी बेटी भी पढ़ रही थी.
दो साल बाक़ी थे उसके गे्रजुएशन में. वह भी यही सोचे. चलो अच्छा है. जब तक
वह ग्रेजुएट हो जाएगी.
और फिर दोनों का निकाह हो गया. और फुज़ेल दुबई चला गया.
कुछ महीनों बाद बादशाह
हुसैन की तबीअत बिगड़ने लगी. काफ़ी दिनों तक बीमार रहे. इस दौरान उन्हें न
जाने क्या गुमान गुज़रा, कहने लगे. वह अपने गांव जाएंगे और वह वहीं मरना
चाहते हैं. और अपने बुजु़र्गों की मिट्टी में ही दफ़न होना चाहते हैं. और
फिर सारा कारोबार छोड़-छाड़ कर, घर-बार बेचकर रख्ते-सफ़र बांध लिए. और
ओमकार को कहला भेजा,’’ भई, अपनी बहू को ले जाओ....और मुझे इस फ़र्ज़ से
सबक़दोश करो......‘‘
इस दौरान उनकी माली हालत भी काफ़ी ख़राब हो गई थी. ऐसा मूज़ी मर्ज़ लगा था कि हालत पतली कर दिया था.
ओमकार
ख़बर पाते ही दौड़े आए और बहू को विदा करा कर चलने लगे, तो बादशाह हुसैन
कुछ नक़द और सामान देते हुए बोले, ’’भई ओमकार ,क्या-क्या थे दिल में अरमान.
मगर सब ख़ाक में मिल गए. मर्ज ने ऐसा घेरा कि कहीं का न रखा. अब, बस यही
पूॅजी बची हुई है, जो बेटी को दहेज में दे रहे हैं. हंसी-ख़ुशी क़बूल कर
लो.....‘‘
ओमकार ने आज उनका भी हाथ ठीक उसी ढंग से पकड़ लिया. जिस तरह कभी मरते
वक्त जिगरी दोस्त अल्लाहबख़्श का पकड़ लिया था. बोले,’’दोस्त, मैंने, जो यह
शादी की थी. आपकी लड़की को नेक सीरत देखकर ही की थी. हमारे फुज़ेल के लिए
यह लड़की मौजूॅ थी. आप यह सब रखो.... हमको इसकी कोई ज़रूरत नहीं. आप अपनी
बेटी को सिर्फ़ एक जोडे़ में ही विदा कर दो. हमारे लिए दूल्हन ही दहेज
है...बाकी सब हराम समझता हूंॅ....‘‘
बादशाह हुसैन खड़े होकर ओमकार का हाथ मज़बूती से पकड़ लिए. उनकी आंखें
छलक आईं, कहने लगे,’’ भाई! आप जैसा इंसान हमारी क़ौम में होता तो हमको
बड़ा फ़ख़्र होता....आप इंसान नहीं फ़रिश्ता हो.आपने एक गैर क़ौम के बच्चे
की परवरिश की.उसकी शनाख़्त के साथ उसको तालीम व तरबीयत दिया. आज लोग लड़की
वालों से दहेज के नाम पर अच्छी-ख़ासी रक़म ऐंठ रहे हैं. आप ‘न‘ बोेल रहे
हो. अगर, आज आप चाहो तो मेरी बेटी को छोड़ कर, दूसरी किसी लड़की से फुजे़ल
का रिश्ता मुंहमांगी रक़म पर तय कर सकते हो......‘‘
और फिर सईदा एकदम सादे ढंग से ओमकार के साथ उनके घर आ गई. ऐसे ढंग से
दुल्हन को घर लाकर ओमकार ने काफी ख़ुशी महसूस की. सईदा ससुराल आकर अपने
फ़रायज़ बख़ूबी अंजाम देने लगी.
वह रोज़ सुबह उठ जाती.नमाज
पढ़ती.तिलावत करती.घर का सारा काम करती और जब ससुरजी की पूजा-पाठ का वक्त
हो जाता, तो सहेन की फुलवारी से फूलों को चुन कर, थाली में सजाकर उन्हें
देती,’’यह लो काकाजी.....जाओ और पूजा कर आओ.....!‘‘
काका का यह रोज़ का मामूल था. वह रोज़ सुबह उठते. मामूल से फ़ारिग़
होकर बैठते. बहू भी अपनी नमाज़ और तिलावत से फ़ारिग़ होती. जब देखती काका
तैयार हो गए हैं. वह उनको पूजा की थाली पेश कर देती; और फिर वह एक हाथ में
छड़ी और दूसरे हाथ में थाली लेकर मंदिर की ओर चल देते.
बहू के आ जाने से उन्हें काफ़ी आराम हो गया था. बहू भी उन्हें अच्छी
मिली थी. वह उसपर नाज़ाॅ थे. अब, बस उनकी एक ही ख़्वाहिश थी. किसी तरह
फुज़ेल आ जाए और सारा करोबार उसके हवाले करके चारों धाम की यात्रा पर निकल
जाएं.
एक दिन खत आया. वह शहज़ादा आ रहा है. काका ने कहा,’’ चलो बेटी! तुम भी चलो एयरपोर्ट तक....तुम्हारा ख़ाविंद आ रहा है......‘‘
सईदा ने लजाते हुए कहा,’’ नहीं काका, आप जाएं.....मैं उनका यहीं इंतज़ार करूॅगी....‘‘
काका ने देखा, इतनी आला तालीमयाफ़ता होने के बावजूद उसपर विदेशी
तहज़ीब का कोई रंग नहीं चढ़ा था.जबकि ऐसे हालात में लड़कियाॅ इंग्लिश के
2-4 अल्फ़ाज़ क्या सीख लेती हैं. उनके रहन-सहन,खान-पान और कपड़े-लत्ते का
अंदाज़ ही बदल जाता है.
उसकी यह अदा उन्हें अच्छी लगी. मगर उन्होंने हॅसकर कहा,’’बेटी,अब
ज़माना बदल गया है.....ख़ाविंद जब बाहर जाता है तो औरतें उसे एयरपोर्ट तक
छोड़ने जाती हैं. टा-टा और बाॅय-बाॅय कहती हैं.....और जब विदेश से आता है,
तो ख़ूब बन-ठन कर.....उसे लेने जाती हैं.......और तुम हो कि ऐसे ही बैठी
हो......शरमा रही हो....कमाल है....!‘‘
’’काका.....!‘‘ वह लजा कर बोली,’’ यह सब मुझे अच्छा नहीं लगता.....?‘‘
’’यही तो गृहलक्ष्मी के नुक़ूश हैं......मेरा इन्तिख़ाब ग़लत न हुआ....इसके लिए मेरा दिल नाज़ाॅं हैं.......!‘‘
और
फिर वह अपने बूढे़ हाथ को उसके (डुपट्टा से ढके)े सर पर रख कर आशीर्वाद
देते हुए चले गए,’’ ठीक है.... ठीक है.... तुम मेरा यहीं पर इंतज़ार करो.
मैं तुम्हारे ख़ाविंद को लेकर आता हूॅ....!‘‘
ओमकार सहार एयरपोर्ट पर पहॅुच गए. दुबई की फ्लाईट आई. लोग-बाग बाहर
निकले और चले भी गए. मगर उनका लख़्ते-जिगर, जान से ज़्यादा अज़ीज़ अभी तक न
निकला. वह सोच रहे थे. अभी वह पीठ पर बैग़ लटकाए ख़रामाॅ-ख़रामाॅ चहकता और
बलखाता किसी तरफ़ से नमूदार हो जाएगा और,’’काका....!‘‘कहकर उनसे लिपट
जाएगा.
मगर अफ़सोस! वह कहीं से भी न नमूदार हुआ और वह सूरते-सवाल बन गए कि वह
क्यों न आया? क्या वह किसी और तरफ़ से घर चला गया? लेकिन वह गया किधर से?
वह तो सामने ही गेट पर खड़े हैं. इसी तरह वह सोचते-सोचते घर की तरफ़ चले
आए.
जब, वह घर आए तो देखा,
सईदा बेक़रारी के आलम में दरवाज़े पर खड़ी है. काका को अकेला आता देखकर
उसके दिल ने हलचल मचाना शुरू कर दिया. काका से आते ही उसने सवाल
किया,’’वह......?‘‘
काका ने उदास लहजे में कहा,’’ वह नहीं आया.......?‘‘
’’नहीं....!‘‘सईदा दर्द व अलम की जिं़दा तस्वीर बन गई.
अब
और ज़्यादा न उनको कहने की ताक़त थी और न तो उसे सुनने की. दोनों ख़ामोश.
एक धड़के के साथ.....एक ग़म के साथ.... रंज और फि़क्र में डूबकर एक-एक कोने
में बैठ गए.
उस दिन उन लोगों ने न कुछ खाया और न तो पीया. सारी रात एक धड़का सा
लगा रहा. अगले दिन जब सुबह का अख़बार आया तो काका अख़बार देखते ही चैंक
गए,’’ अरे, यह क्या...? इसमें छपा है....दुबई से आते ही सहार एयरपोर्ट पर
फुज़ेल गिरफ़्तार.....उसका मुंबई बम-ब्लाॅस्ट में हाथ होने का शुबहा....यह
इण्डियन मुजाहिदीन का मेम्बर है....!‘‘
’’नहीं....!‘‘सईदा ने जब काका की ज़बानी यह खबर सुनी तो उसके पाॅव के
नीचे की ज़मीन खिसक गई.और वह चिल्ला उठी,’’काका, यह नहीं हो सकता
है...‘‘उसकी आवाज़ उसके होंठ बेतरह काॅप रहे थे.
’’वही तो मैं सोच रहा हॅू....‘‘ओमकार ने सर पकड़कर गंभीरता से कहा.
’’यह कोई साजि़श है...पोलिस को जब कोई मुजरिम नहीं मिलता, तो वह किसी
बेक़ुसूर को फॅसा देती है...क्योंकि उन्हें कोई मुजरिम दिखाना होता है और
अपनी कमियों को छुपाना. और अपने आला अफ़सरों को जवाब देना होता है...‘‘
’’ऐसा ही लगता है....?‘‘ काका ने कहा,’’मेरा दिल कहता है. मेरा फुज़ेल
बे-गुनाह है....‘‘और फिर उन्होंने देखा.बहू की आॅख से आॅसुओं का क़तरा बह
निकला. बहू के दर्द व अलम को महसूस करके वह जी-जान से तड़प गए.
कल
जब वह सहार एयरपोर्ट पर गए,तो उन्होंने देखा एयरपोर्ट पर पोलिस का काफ़ी
बंदोबस्त था. उन्होंने समझा. हो सकता है. ब्लाॅस्ट हुआ है उसी के चलते कुछ
एहतियात बरती गई होगी. या कोई अंडरवल्र्ड का सरग़ना या कोई बड़ा अपराधी आता
होगा. उसी को गिरफ़्तार करने के लिए ऐसा किया गया होगा. यह तो मामूली बात
थी. आए दिन ऐसा होता रहता था. अख़बारों में भी यह पढ़ने को मिलता था.
उन्होंने भी उसे कुछ ख़ास अहमियत न दी.
मगर उन्हें क्या मालूम था? यह सब उन्हीं की औलाद के लिए हुआ है; और
फिर जब वह उदास और मायूस आ रहे थे, तो उन्होंने देखा. पुलिस अपने घेरे में
किसी नौजवान को ले कर जा रही है. मगर उन्हें क्या पता था? यह उन्हीं की
औलाद फुज़ेल है? दूर से जब उन्होंने यह मंज़र देखा,तो उन्हें शक़ ज़रूर हुआ
था. मगर उन्होंने इस ख़्याल को झटक दिया था. उनके दिलो-दिमाग़ ने
कहा,’ना......कहाॅ वह सीधा-सादा और तालीमयाफ़्ता और कहाॅ यह पुलिस....?‘‘
आखि़रकार, वह इस ख़्याल को झटकते हुए उदास व मग़मूम घर की तरफ़ चले आए
और अब, यह ख़बर पढ़कर अपने फुज़ेल से मिलने के लिए बेताब हुए जा रहे थे.
फिर,
वह फुज़ेल को छुड़ाने के लिए एक थाना से दूसरे थाना चक्कर मारने लगे.मगर
उनकी कहीं भी न सुनी गई.बस, हर जगह उन्हें डांट पड़ी,’’मालूम,वह कौन है?
बड़े आतंकवादियों से मिला हुआ है.....मुंबई में जो बम-ब्लाॅस्ट हुआ है.....
वह इस केस का मास्टर-माइंड है.....!‘‘
अब, बूढ़े काका कहाॅ जाएं और क्या करें? उनका दिमाग़ कुछ काम नहीं
करता था? उधर सईदा का रो-रो कर बुरा हाल था और इधर इनका.वह अपने आपको
संभालें या सईदा को? बड़ी मुश्किल में थे. कुछ समझ में नहीं आता था.
वह तो पुलिस का इल्ज़ाम था.मगर उनका दिल बार-बार यही कहता था. उनका फुज़़ेल बे-कु़सूर है......मगर उनके दिल की सुनने वाला कौन था?
आज महीनों का अरसा गुज़र
चुका था. मगर वह उससे मिल नहीं पाए थे. उनके दिल में बहुत अरमान था. वह
अपने बच्चे से मिलें. उसे देखें,उसके दिल का हाल सुनें. मगर पुलिस मिलने ही
नहीं देती थी. बस, एक बार दूर से ही अदालत में देखे थे. जब से आज तक दीदार
नहीं हुआ था.
इस मद में उन्होंने अपना पैसा पानी की तरह बहा दिया था. काफी कुछ
ख़ाली हो गया था. इस दौरान पुलिस भी आकर उनके घर-द्वार का मुआइना कर चुकी
थी और सईदा से भी कई अच्छे-बुरे सवाल कर गई थी.
आखि़रकार, वह भटकते-भटकते एक पुलिस वाले के घर पहुंच गए. और रो-रोकर कहने लगे, ’’साहब, मेरा बेटा बेकु़सूर है....छोड़ दीजिए......‘‘
’’यह कोई नई बात नहीं है. हर आदमी को उसका बच्चा गुनाहगार होकर भी
बेगुनाह लगता है. तुम्हें मालूम है, तुम एक गुनाहगार का साथ दे रहे हो. तुम
हिंदू होकर भी एक मुसलमान के साथ हो. तुम्हें शर्म आनी चाहिए. मुसलमान इस
देश के ग़द्दार हैं......तुम उसका साथ न दो. वर्ना तुम को भी ’पोटा‘ के तहत
गिरफ़्तार कर लूंगा और अंदर डाल दूंगा. ख़ैर, मनाओ कि तुम मुसलमान नहीं
हो. वर्ना अब तक तुम भी उस लौंडे के साथ ’पोटा‘ में सड़ रहे होते. जाओ और
भाग जाओ यहाॅ से. बड़े आए दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने वाले......‘‘
पुलिस वाले ने उन्हें डाॅंटकर भाग दिया. वह अपने आपको अपमानित महसूस करते वहां से निकल आए..
वह
सोचने लगे, ’मुसलमान इस देश के ग़द्दार होते हैं..... नमक हराम होते
हैं..... आतंकवादी होते हैं..... मगर अल्लाहबख़्श तो नहीं था. बादशाह हुसैन
भाई तो नहीं थे..... उन्होंने तो कभी एक फुलझड़ी भी नहीं छोड़ी. मैं तो
बचपन से ही उन्हें जानता हूंू. और वह तुफै़ल जो मेरा लंगोटिया यार है. वह
कहां अतंकवादी है......?हां, मैं यह मानता हॅू. चंद लोग होंगे
देशद्रोह,गुण्डे,आतंकवादी और स्मॅगलर. मगर सब तो नहीं. किसी एक के किए की
सज़ा पूरे समाज को मिले.यह न्याय नहीं है. ऐसा कौन सा समाज है जिसमें
आतंकवादी नहीं हैं.....सभी में तो हैं.... और वह इस विषय में गहरे तक सोचते
चले गए. और कई नाम उनके चित्त पर आए मगर किसी का नाम होंठों पर नहीं
लाए....शायद इसमें भी उन्हें ख़तरे की बू-बास आई.
उनका नौनिहाल आज़ाद हो जाए. वह बस इतना ही चाहते थे. और इस तगो-दू में
रात-दिन लगे रहते. इसकी सिफ़ारिश ला, उसकी सिफ़ारिश ला. और दोनों हाथों से
मुठ्ठी भर-भरकर वकील को, सिपाही को, दारोग़ा को रूपया-पैसा देते. मगर सब
बेसूद. छूटने की कोई सूरत नज़र न आती.पैसा सब पानी में जाता.
वह दिन-ब-दिन मायूसी के सियाह अॅधेरे में डूबे जाते थे.
एक सुबह,जब वह नहा धोकर बैठे तो सईदा रोज़ की तरह पूजा की थाली लाकर उनके सामने रख दी,’’यह लो काका.....!‘‘
बूढ़े ओमकार ने थाली लेने से इंकार कर दिया और कहा,’’अब, इसका क्या फ़ायदा......?‘‘
पर अचानक उनकी निगाह सईदा पर पड़ी तो उसका कुम्हलाया चेहरा और आॅसुओं
भरी आॅखें देखकर उनकी रूह तक बेचैन हो गई.उन्होंने ख़्याल किया,’उनकी वजह
से इस बेचारी को दुःख हुआ है.....न वह इसका ब्याह कराते....न तो इसे यह
दुःख मिलता....सबकुछ मेरी ही वजह से हुआ है..... वह बड़ी ही मायूसी से थाली
लेकर बोले,’’ लाओ, एक बार और भगवान के हुजू़र अर्ज़ करता हॅू....शायद सुन
लें....उसके बाद कभी भी मंदिर नहीं जाऊंगा....आखि़र इतनी पूजा-अर्चना की,
क्या फ़ायदा हुआ.......?‘‘
सईदा कुछ नहीं बोली.बस सिसकती हुई अपनी कमनसीबी पर आठ-आठ आॅसू बहाती
रही.और फिर वह पूजा की थाली लेकर मंदिर की सीढि़यों पर चढ़कर भगवान की
मूर्ति के सामने जा पहॅुचे. और उसके आगे दो ज़ानूॅ बैठकर. पूजा के जो फूल
थे,उनके चरणों में चढ़ा दिए.उसके बाद निहायत ही आजिज़ी से बोले,’’भगवान!
अगर कुछ भला होता है तो, उसका भला कर दे. जो रोज़ तेरी पूजा की थाली सजाकर
देती है.....और मैं कुछ नहीं कहूॅगा.....बस, आज इतना ही कहने आया
हॅू.....और तू सुन ले.... आज के बाद न आऊंगा.....अब आऊंगा तो इकट्ठा
ही....वर्ना कभी नहीं....... मेरा यह कठोर वचन है...सुन ले.....!‘‘
और फिर वह थाली भी वहीं छोड़कर ख़ाली हाथ चले आए.जैसा पहले आते वक़्त
भगवान के पैर चूमते थे,प्रसाद लेते थे.वैसा आज कुछ भी नहीं किए.
आज
सालों-साल हो गया.कितनी ईदें आईं.....कितनी दिवालियाॅ गईं,मगर फुज़ेल जेल
से नहीं छूटा. उनकी सारी कोशिशें नाकामो-नामुराद ही रहीं. उनका दिल टूट
गया.दौलत बेशुमार चली गई. कारोबार ठप हो गया. दूकान बिक गई और यह घर भी
गिरवी हो गया. मगर कुछ भी हासिल नहीं हुआ. इन सब बातों से ओमकार बहुत
दिलबर्दाश्ता हुए.
अब उन्हें उम्मीद की कोई किरन नज़र न आती थी. वह बेहद मायूस व उदास हो
गए.सारा-सारा दिन,सारी-सारी रात घर में ही पड़े रहते. हां,कभी-कभी रातों
को सन्नाटे में निकल जाते.
अब,दिन-ब-दिन उनकी हालत बिगड़ने लगी
थी....और सईदा का भी बुरा हाल था. वह गोरी-चिट्टी,फूलों सी शादाब. शबनम सी
शफ़्फ़ाफ़ लड़की स्याह पड़ती जाती थी....सेहत भी गिरती जा रही थी.. खाना
पकाने का दिल नहीं करता. फिर भी काका के लिए दिल मारकर चूल्हा जला लेती है.
मगर, न तो काका ही खाते और न तो वह.
बूढे काका उससे कहते,’’ बेटी, खाना खा लो वर्ना जिओगी कैसे?...मायूस न हो? एक दिन हमारा फुज़ेल ज़रूर आएगा.....!‘‘
यही
अल्फ़ाज़ वह काका को दोहरा कर सुनाती,’’ काका, खा लो. अगर नहीं खाएंगे तो
जीएंगे कैसे? उसकी ज़ात से मायूस न हों. अगर वह बेगुनाह हैं, तो ज़रूर
आएंगे......और उस दिन के लिए हमको जीना है..... और तैयार रहना है......!‘‘
और फिर एक दिन ऐसा भी आया. जब काका खाट पकड़ लिए; और वह एक बार जो खाट
पकड़े तो फिर नहीं उठे. न ठीक तरह से खाना, न तो पानी. नक़ाहत और कमज़ोरी
दिन-ब-दिन बढ़ती गई. न कोई पूछने वाला और न कोई सुनने वाला. और फिर जब जीने
वाला ही न जीना चाहे, तो फिर कौन बचा सकता है. जब दिल पर ज़ख़्म लग जाए तो
इंसान बचता ही कहां है?यही कुछ हाल काका का भी था. चोट दिल पर लग गई थी.
आज कई दिनों से उनकी बेहोशी और नीम-बेहोशी का दौर चल रहा था. एक
डाॅक्टर आया और कुछ दवायें भी दे गया. मगर उसे नहीं खाया. उन्होंने
कहा,’’बस बेटी, अब,बस हो गया..... अब,अगर मरने वाली कोई दवा हो तो दे
दो...... पर, अब जीने का कोई ख़्वाब न दिखाओ..... अब दुनिया रहने के क़ाबिल
नहीं रही. अब, मैं यहां रहना ही नहीं चाहता. जहाॅ इंसान को सिर्फ़ जा़त और
मज़हब से ही जाना और पहचाना जाता हो....ऊब गया हॅू मैं इस अधर्मी दुनिया
और दुनिया वालों से....‘‘और फिर उन पर ग़शी त़ारी हो गई.
सईदा बे-इखि़्तयार रो पड़ी. दिन-ब-दिन उसपर भी नक़ाहत अपना असर दिखा
रही थी. रोते-रोते वह भी कब बेहोश हो गई? उसे एहसास ही न हुआ. रात के पिछले
पहर, जब उसकी आंख खुली तो उसने सुना. काका आहिस्ता-आहिस्ता बड़बड़ा रहे
हैं,’’बेटी....!बहू.....!मेरा कहा-सुना माफ़ कर देना.......बेटी.... तुम ने
सुना नहीं.... मैंने क्या कहा...?‘‘
घर की दीवार से टेक लगाए सईदा पड़ी थी और वह हड़बड़ाकर जल्दी से काका
की खाट के पास पहुंच गई,’’काका! क्या बात है......?‘‘उसने उन्हें झंझोड़ा.
’’ब....बे....बेटी.....!‘‘
काका बे-ख्याली में बड़बड़ाए,’’ बेटी, मुझे माफ़ कर देना..... मैंने
तुम्हें यहाॅ लाकर बड़ा पाप किया है...... कोई सुख नहीं दिया, सिवाय दुःख
के..... मैं महापापी हॅू.....!‘‘
सईदा अपनी सूनी-सूनी आंखें फाड़कर देखी, काका की आंखें बंद थीं और वह बड़बड़ाए जा रहे थे.
वह
आज कई दिनों से ऐसा ही कर रहे थे. मगर उसका ध्यान उधर नहीं गया था. आज जब
उसने देखा तो कुछ पूछना चाही. मगर वह ख़ामोश हो गए. एक-दो आवाज़ लगाई भी
मगर जब कुछ नहीं बोले, तो वह भी चुप हो गई. फिर थोड़ा हटकर जहां पहले बैठी
थी वहाॅ जाकर दीवार से टेक लगाए, किसी बेवा स्त्री की तरह सोगवार सी बैठ
गई.
बूढ़े काका ने फिर रट लगाई,’’बेटी.....!‘‘
’’काका......!‘‘बेटी चैंक गई.
’’बेटी.........!‘‘
’’काका......!‘‘
अबकी
बार वह भी न उठी. बस वहीं से नक़ाहत व गुनूदगी में डूबी आवाजें़ लगाती
रही. जब तक काका की आवाज़ आती रही. वह उनका जवाब देती रही. दोनों की आवाज़
में एक तड़प थी...... ख़लिश थी.... कसक थी..... और एक दिलख़राश मध्यम सी
चीख़. मगर समझने वाला ही समझ सकता था इस चीख़ को.....दर्द को.... ग़म
को.... ख़लिश को.... सब के बस की बात नहीं थी.
धीरे-धीरे बूढ़े काका की आवाज़ शांत हो गई. जब उनकी आवाज़ शांत हुई तो सईदा भी ख़ामोश हो गई.
अगली
सुबह उस घर से दो जनाज़े निकले.जनाज़े चलते हुए जब शाहराह पर पहॅुचे, तो
एक पुलिस की वेन आ रही थी. जिनमें कै़दी बंद थे. अदालत में पेशी के लिए ले
जाए जा रहे थे? उसके आने से दोनों जनाज़े दो बाज़ू़ बट गए. और पुलिस की वेन
वहां धीमी हो गई. पुलिस इस अनोखे मंज़र से हतप्रभ थी. एक तरफ हिंदू की
अर्थी तो दूसरी तरफ मुस्लिम का जनाज़ा. और सदाए बाज़गश्त,’’ लाईलाहा
इल्ललाह....मुहम्मदुर्रसूलुल्ला ह.....राम नाम.......सत्य है.....!‘‘
इस अनोखे मंज़र को कैै़दी भी जाली वाली गाड़ी से हैरतो-ताज्जुब से देख रहे थे.
उसी
गाड़ी में फुजे़ल भी था. उन दोनों जनाज़ों को देखते ही अपने बाप का जनाज़ा
याद आ गया और उसी पल एक हूक सीने में उठी,वह तड़पकर गिर गया.उसके साथी
क़ैदी ने लपककर उसका सर अपने गोद में ले लिया और पूछा,’’ फुजे़ल! तुझे क्या
हो गया.....?‘‘
वह दर्द से तड़पते हुए ब-मुश्किल तमाम इतना ही कहा,’’कुछ नहीं मेरे दोस्त....ग़म की दुनिया से दिल भर गया.....!‘‘
यही वह पल था जब उसकी रूह उसके बदन से परवाज़ कर गई!
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