गुरुवार, 18 जुलाई 2013

पांच महिनों में महिलाओं पर अत्याचार के ४९ हजार मामले


शैलेष जायसवाल / मुंबई
   एक चौंका देनेवाली बात सूचना अधिकार के तहत सामने आई है। महिलाओं पर होनेवाले अत्याचारों के मामलों को लेकर जल्द पैâसला हो इसलिए फास्ट ट्रैक कोर्ट कानून लागू किया गया। इसके बावजूद पिछले पांच महिनों में राज्य के सत्र न्यायालयों में महिलाओं पर अत्याचार के कुल ४९ हजार १७० मामले दर्ज हुए हैं।
   महिलाओं पर होनेवाले अत्याचारों पर रोक लगाने के लिए भले ही सामाजिक या राजनैतिक स्तर पर कानून में सुधार लाने का प्रयास जारी हो, या सरकार ने जो भी कानून या विधेयक बनाए हो, मगर महिलाओं पह हो रहे अत्याचारों के प्रलंबित मामले बिलकुल भी समाधानकारक नहीं हैं। सामाजिक क्षेत्र में काम करनेवाली संस्थाओं ने पिछले कुछ सालों में महिलाओं में जनजागृती का काम किया। पीड़ित महिलाओं को अत्याचार के खिलाफ निडर होकर पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने को लेकर अभियान संस्थाओं ने चलाया था। जिससे उक्त मामलों में इस तरह का इजाफा हो गया। हालांकि महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक स्तर एवं परिवार की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे मामलों को जल्द ही निपटाने के लिए जलदगति न्यायालय (फास्ट ट्रैक कोर्ट) की स्थापना की गई, लेकिन इसके बावजूद पिछले साल की तुलना में इस साल जनवरी से मई २०१३ तक केवल पांच महिनों में ही महिलाओं पर अत्याचार के ४९ हजार १७० मामले दर्ज हुए। 
   आरटीआई एक्टीविस्ट विहार दुर्वे द्वारा सूचना अधिकार के तहत पिछले पांच महिनों में दर्ज हुए पिछड़ी जातियों पर अन्याय, भ्रष्टाचार, संपत्तीके मामलों समेत महिलाओं पर अत्याचार के मामलों की जानकारी मांगी थी। जिससे उक्त चौंकानेवाली बात सामने आई। आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार महिलाओं पर अत्याचार के मामलों का संख्या तो ज्यादा हैं ही, साथ ही पिछड़ी जातियों पर हो रहे अन्याय के ३ हजार २५८, भ्रष्टाचार प्रतिबंधक कानून के अंतर्गत ३ हजार आठ, दुपहिया वाहन दुर्घटनाओं के ९० हजार ८२० और संपत्ती विवाद के कुल ७५ हजार ६७४ मामले अब भी अदालत में प्रलंबित हैं।

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