रोजाना मरने है ९ लोग
(शैलेष जायसवाल)
मुंबई की हर सड़कों पर अब हर रोज मौत मंडराने लगी है। एक सर्वे के मुताबिक दुर्घटनाओं के रूप में मुंबई की सड़के रोजाना ९ लोगों को निगल रही है। जबकि अब शहर में बेमौत मारे जाने के और भी कई रास्ते खुल गए हैं। शहर की लाईफ लाईन लोकल ट्रेन के हादसों में भी लोगों की लाईफ ही समाप्त होती जा रही है। ऐसे में सड़क पर या ट्रेनों में सफर करते समय भी थोड़ी सी बात को लेकर आपस में बढ़ते हिंसा के कारण जाने गवाने का मामला भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
सड़क पर चलते हुए गाड़ी किसी से टकरा गई या साइड लेने के चक्कर में कोई आप से खफा हो गया या फिर किसी के गुस्से को आप पढ़ ही नहीं पाए तो समझिए कि आफत आ सकती है। ऐसी आफत कि वह मौत बनकर भी टूट सकती है। एक सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार मुंबई ट्राफिक पुलिस आंकड़े ये बताते हैं कि सन २०१० से फरवरी २०१२ तक शहर की सड़को पर हुए हादसों में अबतक ६७० लोगों की जाने जी चुकी है। जिनमें से १४७ हादसे शराब पीकर गाडी चलाते समय हुए है। जबकि ७७ हादसे ऐसे है जिनमें दुर्घटना होने पर किसी को तो कुछ नहीं हुआ, मगर गाड़ी के लगाव में आपसी हिंसा के चलते मौंते हुई है। इनमें से कुछ घायल लोग अब भी अस्पतालों में उपचार ले रहे हैं।
रेल विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अकेले अंधेरी स्टेशन पर पिछले तीन माह में १४ मौते हुई है। जबकि जोगेश्वरी स्टेशन के फाटक पर पटरी पार करते समय १७ लोगों ने अपनी जान गंवाई। वही गोरेगावं में ट्रेन हादसे से मरनेवालों का आवंâडा १० है। रेल विभाग के मुताबिक इनमें से अधिकांश हादसे पटरी पार करते वक्त मोबाईल पर बात करते समय हुए है।
जोगेश्वरी के एक रबर स्टैम्प मेकर दुकान के मालिक कृष्णा मारोती टोणपे के मुताबिक लोगों की सोशल लाइफ बहुत सीमित हो गई है। टीवी, कंप्यूटर या मोबाइल पर थिरकती उंगलियां समाज से अलग-थलग कर देती हैं। यही गैजेट सबसे बड़े दोस्त दिखाई देते हैं। इंसानियत के बारे में सोचने-समझने की न जरूरत समझी जाती है और न ही उसके लिए किसी के पास समय है। राह चलते जरा भी किसी को धक्का लग जाए तो व्यक्ति गुस्से से लाल हो जाता है। जिससे कोई भी जानलेवा हादसा बन जाता है।
समाजसेवक जयवंत लाड के मुताबिक समाज में आ रहे बदलाव के साथ सिर्फ उपदेश से ही दिमाग को ठंडा नहीं रखा जा सकता और न ही यह माना जा सकता है कि भीड़ तो बढ़ेगी ही। क्या कारण है कि जो लोग खुद ड्राइव कर रहे होते हैं, वही रोड रेज पर उतारू हो जाते हैं। अधिकतर गाडियों का बिमा होता है। ाqजससे टूट-पूâट का ज्यादातर मुआवजा भी बिमा वंâपनियों से मिल जाता है तो फिर यह हिंसा क्यों? भीड़ के कारण उपजी खीझ तो रोड रेज नहीं बन रही। मुंबई में ऐसा इसलिए नहीं होता कि वहां ट्रैफिक ज्यादा अनुशासित है। मंबई शहर को भी अनुशासन का पाठ पढ़ाना जरूरी है। क्या ट्रैफिक पुलिस यह जिम्मा लेगी?
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