कसाब मेहमान नवाजी राजनितिक षडयंत्र है या फिर आतंकवाद
(शैलैष जायसवाल)
२६ नवंबर को हुए हमले की आज तीसरी बरसी है। इस काले दिन पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब ने मुंबई में १६४ निर्दोषों की निर्मम हत्या कर डाली और उसी हत्यारे की आवभगत में सरकार ने जनता की गाढ़ी कमाई के १६ करोड़ रूपए लुटा दिए। देश के सबसे हाई प्रफाइल कैदी अजमल कसाब को २७ लाख रुपये प्रतिदिन के हिसाब से साधारण भोजन, आईटीबीपी की सुरक्षा पर १०.८७ करोड़ और ५.२४ करोड़ रुपये से बने विशेष कक्ष में सुलाया जा रहा है। कसाब की फांसी में हो रही देरी को लेकर अब यह कहना मुश्किल है कि यह राजनितिक षडयंत्र है या फिर आतंकवाद !
अब तो लोग यह सोचने को मजबूर हैं कि देश की आन-बान और शान के लिये अपनी शहादत देने वाले जाबांज शूरमाओं की कुर्बानी व्यर्थ गई। कसाब की फांसी को लेकर केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई सकारात्मक प्रतिसाद नहीं मिला है। महत्वपूर्ण है कि मुंबई हमले को तीन साल पूरे होने के बाद भी अभी तक कसाब को फांसी नहीं दिये जाने से जनता के अंदर भारी आक्रोश है।
जब दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज व्यंकटेश नामक एक गरीब इनसान से दोपहर का सामना संवाददाता ने उसका हाल पूछा तो उसने जवाब दिया कि ऐसी जिंदगी से मैं तंग आ गया हूं। मैं कसाब बनना चाहता हूं। आखिर क्यु वो बनना चाहता है अजमल कसाब ? ़जवाब मांगने पर उसने कहा कि 'अपनी भी जिन्दगी किश्तों में कटती है। हर वक्त मन में खौफ रहता है कि अब क्या होगा। मौत के साएं में जीकर पेट के लिए संघर्ष करना बड़ा ही भारी लगता है। ंआज मुंबई का हर आदमी एक अजीब डर के साथ अपनी जिंदगी किश्तों में जी रहा है। बेखौफ है तो बस्स ! वो आतंकी जिन्हें सरकार पाल रही है ।
बता दें कि व्यंकटेश गोरेगांव स्थित पश्चिम एक्सप्रेस हाईवे के नीचे ट्राफिक सिग्नल पर भीख मांग कर अपना गुजारा करता है। वह कहता है कि अधुरी पढाई के कारण उसे कोई नौकरी नहीं देता, इसलिए वह भीख मांगता है। मगर फिर भी कई लोग उसके भीख मांगने पर सवाल करते हुए उसे भीख नहीं देते हैं।
आज बेखौफ की जिन्दगी जी रहे 'कसाब' के कमाल की बात तो ये है की जहाँ 'जनता को महेंगाई का आटा बनाया जा रहा है वही पर अजमल कसाब पर हर महीने ८:५० लाख रुपये लुटाये जा रहे है। हर रोज उसे अखबारों का ढेर और जन्मदिन पर केक परोसा जाता है। सेंकडों निर्दोष लोगों को सरेआम मारनेवाले 'कसाब' के स्वास्थ की चिंता भी हमारी सरकार करती है। जबकि यहां कई एसे भारतीय नागरिक भी है, जो फूटपाथ पर सोते हुए दवाईयों की कमी की वजह से दम तोड़ते है। इसिलिए भिखारी व्यंकटेश कहता है कि 'वाह रे कसाब...! क्या नसीब पाया है.... सरकार की वजह से तो आज आमआदमी का कफ़न सस्ता और तु महँगा बन गया है ।
उल्लेखनीय है कि किसी के साथ मारपीट करने पर या फिर पाकिट मरने पर इस देश का कानून 'आमआदमी' को कड़ी से कड़ी सजा देता है। मगर सेंकडो लोगों को सरेआम गोलियों से भुननेवाले 'कसाब ' को क्यों पुरे देश का महेमान बनाकर पाला जा रहा है? जहाँ पर अपना हक़ मांगने पर आमआदमी पर लाठियाँ बरसाई जाती है और आतंकी का बाल भी बांका नहीं कर सकता है ' कानून '? क्या ऐसा होता है कानून के दायरे में ? '
व्यंकटेश कहता है कि ’मैं डर के साथ मै क्युं जीऊ जिंदगी ?’ आज वो समय है की घर से निकलते वक्त ये कहेना पड़ता है की 'शाम को घर लौटा तो तुम्हारा नहीं तो उप्परवाले का। आम आदमी को भी दिन भर मेहनत करने के बाद महीने के आखर में किसीके सामने हाथ फैलाना पड़ता है ाqक भाई ५०० रुपये की मदद करो, अगले महीने पगार होते ही लौटा दूंगा। मगर 'आतंकी कसाब' को किसी के सामने हाथ फ़ैलाने नहीं पड़ते है। वो सिर्फ हमारी बेवकूफ सरकार को हुक्म देता है और उसे वो चीज भी मिल जाती है जो चीज उसने चाही हो । ठीक उसी तरह अफजल गुरु १० साल से 'और 'अजमल कसाब ३ साल से बड़े आराम की जिन्दगी जी रहा है। क्योंकि शायद 'हमारा कानून और हमारे नेता' ये नहीं चाहते है की इन आतंकियों को फाँसी मिले।
जिस दिन भारत के युवा के दिमाग में ये बात फिट हो जाएगी की इस देश में 'आतंकी’ को सरकार महेमान बनाकर बिठाती है और गरीबों को सरेआम धमाकों में मरने के लिए छोड़ देती है। उस दिन भारत के हर घर में एक 'कसाब' का जन्म होगा। जिसे रोकना सरकार के लिए असंभव होगा क्युं की 'वो कसाब' इस कसाब के जैसा देशद्रोही नहीं होगा। वो दिन दूर नहीं है जब भारत का नौजवान कहेगा की ' किस्तों में जिन्दगी जीने से ' कसाब' बनना अच्छा है । सारा देश उस भिखारी व्यंकटेश के विचारों से सहमत होगा और उस दिन परिस्थिति गंभीर बन जाएगी।
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