गोपाल के लिए एडवोकेट निलेश ओझा ने किया २०० करोड़ मानहानि का दावा
(विजय पवार / मुंबई )
एक फर्जी बलात्कार के आरोप में सात साल की सजा जेल में पूरी करने के तीन महीने बाद मुंबई हाईकोर्ट ने निर्दोष गोपाल शेटे को बाईज्जत बरी किया। मगर इस बदनुमा आरोप के बाद अपना सब कुछ गंवा चुके गोपाल ने हाईकोर्ट के आदेश के बाद अपने पुनर्वसन के लिए सरकार से २०० करोड़ के लिए मानहानि का दावा किया है। गोपाल की ओर से याचिका दायर करनेवाले एडवोकेट निलेश ओझा ने दोषी कुर्ला रेल्वे पुलिस एवं सत्र न्यायाधीश के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की मांग भी की करते हुए आज मंगलवार २९ सितम्बर को हाईकोर्ट में याचिका दायर करेंगे।
हाईकोर्ट ने माना कि नाम की गलती की वजह से आरोपी गोपी की जगह गोपाल शेटे को धोखे से बलि का बकरा बनाया गया। गौरतलब है कि अपनी गरीब परिस्थिति के चलते गोपाल खुद को निर्दोष साबित करने के लिए कोई वकील नियुक्त नहीं कर सका। इस वजह से सत्र न्यायालय ने गोपाल को ७ साल की सजा सुना दी। मगर फिर भी जेल में हिम्मत न हार कर गोपाल ने जेल के अंदर ही अपनी पढाई करते हुए खुद को निर्दोष साबित करने के लिए २०१० में हाईकोर्ट में याचिका दायर की और खुद ही अपनी वकालत की। जेल के अंदर से ही लगभग ४० से भी ज्यादा सुचना अधिकारों (आरटीआई ) के तहत जानकारिया मंगाकर मिले मजबूत सबूतों के आधार पर गोपाल ने खुद को तो निर्दोष साबित कर ही दिया। मगर हाईकोर्ट की जब सुनवाई हुई तब तक गोपाल की सजा पूरी होकर तीन महीने से भी ज्यादा गुजर चुके थे।
मंगलवार को आयोजित पत्रकार परिषद में पीड़ित गोपाल शेटे ने बताया कि ७ साल जेल में बिताने के बाद गोपाल की पूरी दुनिया ही बदल चुकी थी। उसकी पत्नी ने गोपाल की दोनों लड़कियों को अनाथ आश्रम में दाल कर दूसरी शादी कर ली। पिता का सदमे से देहांत हो गया। पिता की चिता को आग लगाने के लिए भी गोपाल को पेरोल या छुट्टी नहीं मिली। माँ की हालत पागलों जैसी हो गई। जमीन जायदाद सबकुछ खत्म हो चूका। ऐसे में अकेले और बर्बाद हो चुके गोपाल ने अपने पुनर्वसन के लिए आजाद मैंदान में ही बैठ कर आमरण अनशन शुरू कर दिया। इस दौरान किसी भी राजनेता या अधिकारी ने गोपाल की मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। तब ऑर्गनाइजेशन ऑफ़ जस्टिस फॉर ह्यूमैनिटी अवेर्नेस (ओझा ) नामक एनजीओ के संस्थापक एडवोकेट निलेश ओझा ने गोपाल की मानहानि के लिए निशुल्क याचिका दायर करने का आश्वासन दिया।
इसी के चलते एडवोकेट निलेश ओझा ने सरकार से दोषी पुलिस और सत्र न्यायाधीश के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए गोपाल के पुनर्वसन के लिए २०० करोड़ रुपये के मानहानि की याचिका दायर की है। पत्रकारों को संबोधित करते हुए एडवोकेट ओझा ने बताया कि झूठे सबूतों के आधार पर किसी निर्दोष को सजा देने के आरोप में भादस की धारा २११, २२० तथा १९४ के तहत पुलिस और न्यायाधीश को कम से कम ७ साल की सजा होनी चाहिए। ओझा के मुताबिक उनके एनजीओ के माध्यम से वे ऐसे ही असहाय कानून पीड़ित लोगों की मदद करते है तथा लोगों को कानूनी जानकारियां देकर उन्हें खुद अपनी वकालत करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
गौरतलब है कि आए दिन बलात्कार के बढ़ते फर्जी मामलों से देश की न्यायव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। महिला आयोग ने खुद माना है की बलात्कार के बढ़ते फर्जी मामलो से निर्दोष पुरुषों को सताया जा रहा हैं और उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा है। अब देखना यह है की निलेश ओझा की याचिका के बाद न्यायपालिका अब कौनसा नया क़ानून लागू कर पायेगी।

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